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केस 1: डिजिटल अरेस्ट · भाग 1 / 3

पार्सल

ये कहानियाँ असली घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन काल्पनिक हैं। किरदार, परिवार, गाँव, बैंक, ऐप और कंपनी के नाम काल्पनिक हैं; किसी असली व्यक्ति या संस्था से समानता संयोग है। RBI, SEBI, पुलिस और 1930 जैसी असली संस्थाओं का ज़िक्र सिर्फ़ जानकारी के लिए है — AQVIK उनसे जुड़ा नहीं है। ये क़ानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है, और शिकायत करने से पैसा वापस मिलने की गारंटी नहीं होती। कोई ग़लती दिखे तो support@aqvik.com पर बताएँ।

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शुरुआत

अवध नेशनल बैंक, हज़रतगंज ब्रांच। गुरुवार, सुबह 11:52।

काउंटर नंबर 4 के सामने रमेश वर्मा खड़े थे। हाथ में RTGS का फॉर्म था, और फॉर्म थोड़ा काँप रहा था। या शायद हाथ काँप रहे थे।

रकम: ₹48,00,000।

कैशियर ने फॉर्म देखा, फिर रमेश जी को। फिर फॉर्म को। "सर… इतना बड़ा ट्रांसफर? किसी को… सब ठीक है न?"

रमेश जी की जेब में फोन था। फोन पर कॉल चल रही थी। म्यूट पर। कैमरा ऑन।

कान में एक आवाज़ गूँजी, जो सिर्फ़ उन्हें सुनाई दे रही थी: "एक शब्द भी गलत बोला, वर्मा जी, तो आज शाम आपकी बेटी के घर पुलिस पहुँचेगी।"

रमेश जी ने मुस्कुराने की कोशिश की। "हाँ बेटा। सब ठीक है। प्रॉपर्टी… प्रॉपर्टी का मामला है।"

कैशियर ने मोहर लगा दी।

ठक।

रमेश वर्मा बैंक काउंटर पर काँपते हाथों से RTGS फॉर्म पकड़े खड़े हैं

वो आवाज़ रमेश जी को अगले तीन साल याद रही।

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Digital Thug Life · Season 1 · Written by AQVIK · Illustrations are AI-generated.