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केस 1: डिजिटल अरेस्ट · भाग 3 / 3

रुको, सोचो, एक्शन लो

ये कहानियाँ असली घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन काल्पनिक हैं। किरदार, परिवार, गाँव, बैंक, ऐप और कंपनी के नाम काल्पनिक हैं; किसी असली व्यक्ति या संस्था से समानता संयोग है। RBI, SEBI, पुलिस और 1930 जैसी असली संस्थाओं का ज़िक्र सिर्फ़ जानकारी के लिए है — AQVIK उनसे जुड़ा नहीं है। ये क़ानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है, और शिकायत करने से पैसा वापस मिलने की गारंटी नहीं होती। कोई ग़लती दिखे तो support@aqvik.com पर बताएँ।

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दरवाज़ा

रात 1:20।

नेहा ने दरवाज़ा खटखटाया। "पापा। दरवाज़ा खोलिए।"

अंदर से आवाज़ बंद हो गई। फिर धीमी फुसफुसाहट: "…कोई नहीं सर, बेटी है… हाँ सर, मैं संभाल लेता हूँ…"

"पापा, मैंने रील सुनी है।" नेहा की आवाज़ काँप रही थी। "आप 'सर' किसको बोल रहे हो?"

सन्नाटा।

फिर बंटी ने वो किया जो सिर्फ़ एक 17 साल का लड़का कर सकता है। उसने दरवाज़े पर कंधा मारा। एक बार। दो बार। पुरानी कुंडी तीसरी बार में जवाब दे गई।

कमरे में रमेश जी ज़मीन पर बैठे थे। फोन अलमारी पर खड़ा था। स्क्रीन पर एक वर्दी वाला आदमी।

नेहा ने फोन की तरफ़ देखा। वर्दी वाले ने भी नेहा को देखा।

"लड़की," उसने ठंडी आवाज़ में कहा, "आप एक सेंट्रल इन्वेस्टिगेशन में दख़ल दे रही हैं। अभी बाहर जाइए, वरना आप भी —"

नेहा ने फोन उठाया। और पहली बार, पाँच दिन में, किसी ने कॉल काट दी।

नेहा कॉल काट रही है, पीछे टूटे दरवाज़े पर बंटी, और ज़मीन पर सिर पकड़े बैठे पापा

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Digital Thug Life · Season 1 · Written by AQVIK · Illustrations are AI-generated.