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केस 10: खाता किराए पर · भाग 2 / 2

किसका पैसा था?

ये कहानियाँ असली घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन काल्पनिक हैं। किरदार, परिवार, गाँव, बैंक, ऐप और कंपनी के नाम काल्पनिक हैं; किसी असली व्यक्ति या संस्था से समानता संयोग है। RBI, SEBI, पुलिस और 1930 जैसी असली संस्थाओं का ज़िक्र सिर्फ़ जानकारी के लिए है — AQVIK उनसे जुड़ा नहीं है। ये क़ानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है, और शिकायत करने से पैसा वापस मिलने की गारंटी नहीं होती। कोई ग़लती दिखे तो support@aqvik.com पर बताएँ।

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41 परिवार

दो दिन बाद। साइबर पुलिस स्टेशन, नागपुर।

इंस्पेक्टर स्वाति भगत ने आदित्य के सामने 41 काग़ज़ बिछाए। एक-एक करके।

"पढ़ो।"

आदित्य ने पहला उठाया। पूजा देशमुख, नागपुर। ₹1,96,000। "टैक्स क्लियरेंस।" शादी के पैसे।

दूसरा। रवि कुमार महतो, राँची। ₹9,800। लोन ऐप "लेट फ़ीस"। डिलीवरी राइडर।

तीसरा। एक 71 साल के रिटायर्ड टीचर, लखनऊ। ₹2,40,000। पेंशन।

चौथा। पाँचवाँ। छठा।

हर काग़ज़ पर एक नाम। एक शहर। एक कहानी। और हर काग़ज़ के नीचे एक ही लाइन: लाभार्थी खाता: A. Verma।

आदित्य के हाथ काँपने लगे। तीन महीने से वो सोचता रहा था "मैं किसी को लूट नहीं रहा।" आज 41 लोग उसके सामने थे। काग़ज़ पर। लेकिन असली।

"मैडम… मुझे नहीं पता था…"

"तुम्हें पता नहीं था कौन," इंस्पेक्टर भगत ने कहा। "लेकिन तुम जानते थे कि कुछ ग़लत है। वरना रॉकी ने क्यों कहा 'किसी को बताना मत'? और तुमने क्यों नहीं बताया?"

आदित्य के पास कोई जवाब नहीं था।

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Digital Thug Life · Season 1 · Written by AQVIK · Illustrations are AI-generated.