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केस 9: पापा, मैं मुसीबत में हूँ · भाग 1 / 2

ब्रूनो का बिस्किट

ये कहानियाँ असली घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन काल्पनिक हैं। किरदार, परिवार, गाँव, बैंक, ऐप और कंपनी के नाम काल्पनिक हैं; किसी असली व्यक्ति या संस्था से समानता संयोग है। RBI, SEBI, पुलिस और 1930 जैसी असली संस्थाओं का ज़िक्र सिर्फ़ जानकारी के लिए है — AQVIK उनसे जुड़ा नहीं है। ये क़ानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है, और शिकायत करने से पैसा वापस मिलने की गारंटी नहीं होती। कोई ग़लती दिखे तो support@aqvik.com पर बताएँ।

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कोल्ड ओपन

भोपाल। अरेरा कॉलोनी। खरे परिवार का घर। शुक्रवार, रात 11:52।

शोभा जी फोन कान से चिपकाए रसोई के फ़र्श पर बैठी थीं। फोन से उनके बेटे की आवाज़ आ रही थी — रोते हुए, हाँफते हुए:

"मम्मी… मम्मी प्लीज़… ये लोग मुझे मारेंगे… पापा से बोलो जल्दी करें…"

दिनेश जी डाइनिंग टेबल पर बैठे थे। हाथ काँप रहे थे। फोन पर बैंक का ऐप खुला था। पिछले 40 मिनट में वो ₹2,70,000 भेज चुके थे।

अब "इंस्पेक्टर राठौर" ₹2 लाख और माँग रहा था। "लड़की ICU में है। हॉस्पिटल का ख़र्चा। वरना केस 'हत्या की कोशिश' का बनेगा, और आपका बेटा दस साल अंदर।"

16 साल की तन्वी दरवाज़े पर खड़ी थी। पजामे में। आँखें लाल।

"पापा," उसने धीरे से कहा। "भैया को वीडियो कॉल क्यों नहीं कर रहे?"

किसी ने जवाब नहीं दिया। क्योंकि फोन पर आर्यन की आवाज़ थी। आर्यन की। वही आवाज़ जो हर रविवार रात को "मम्मी, खाना खा लिया, टेंशन मत लो" कहती थी।

माँ अपने बेटे की आवाज़ कैसे न पहचाने?

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Digital Thug Life · Season 1 · Written by AQVIK · Illustrations are AI-generated.